शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

बढ़ती जनसंख्या को रोकने में मदद करना भी राष्ट्रसेवा



जनसंख्पया दिवस विशेष :  कल्याण मंत्रालय ने पहले से ही पूरे राष्ट्र मेंआपदा में परिवार नियोजन की तैयारी, सक्षम राष्ट्र और परिवार की पूरी जिम्मेदारी’  की थीम पर जनसंख्या पखवाड़ा मनाना शुरू किया है। ताकी देश में बढ़ती जनसंख्या को रोका जा सके। हर साल जनसंख्या दिवस पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित कर परिवार कल्याण की बात की जाती है। लेकिन, फिर भी इसके परिणाम आशा अनुरूप नहीं दिखाई दे रहे । इसकी वजह यह नहीं कि हमारी सरकारें या प्रशासनिक तंत्र सही ढंग से काम नहीं कर पा रहा है। वजह नैतिकता और समझ की है। यह ऐसा मुद्दा है जिसमें जब तक कठोर काननू की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती तब तक परिवार कल्याण का तंत्र सिर्फ आपसे अपील कर सकता है। समझ और नैतिकता आम व्यक्ति को निभानी होगी। राष्ट्र की सेवा करना सिर्फ राष्ट्रीय पर्वों में देशभक्ति दिखाने से नहीं है। हर व्यक्ति का इतना अच्छा नसीब नहीं होता कि वह सीमा पर दुश्मनों से लड़कर देश सेवा कर सके। लेकिन वह बिना लड़ाई लड़े भी देश सेवा कर सकता है। जनसंख्या नियंत्रण में योगदान करना भी राष्ट्र की सेवा ही है। यह भी देशभक्ति का ही एक अंग है। क्योंकि आज राष्ट्र में बढ़ती जनसंख्या ने चिंताजनक हालात पैदा कर दिए है। जिसका भविष्य अंधकारमय हो सकता है। इसके लिए सरकारें अकेली कुछ नहीं कर सकती। इसके लिए हर परिवार का योगदान निश्चित रूप से चाहिए।
जिस गति से जनसंख्या बढ़ रही है, उससे साफ है भविष्य में देश की आर्थिक स्थिति, नीतियां और आने वाली पीढ़िया दलदल में फंसती नजर रही है। यह बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है। जनसंख्या विस्फोट आज का ज्वलंत मुद्दा है। भारत के लिए आंकड़ें चिंताजनक है। यूनाइटेड नेशन्स की रिपोर्ट तो वाकई डरावनी है। इस संदर्भ में बात करे तो जल्द की हमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए ठोस निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यूनाइटेड नेशन्स पॉपुलेशन फंड 2019 का सर्वे बताता है कि पिछले दस सालों में भारत की जनसंख्या 1.2 प्रतिशत की सालान दर से बढ़ी है। जबकि चीन की वृद्धि दर महज 0.5 फीसदी सालाना रही। आंकड़ों में जाए तो अभी चीन की आबादी 142 करोड़ एवं भारत की 136 करोड़ है। महज 6 करोड़ का अंतर है। यह महज इसलिए है क्योंकि हमारी जनसंख्या इस दर से बढ़ती रही तो कुछ ही सालों में हम चीन से आगे निकल जाएंगे।
फिलहाल देश कोविड से जूझ रहा है। इसी महामारी ने देश के हालात पर प्रकाश डालने के लिए मजबूर किया। गांवों से रोजगार के लिए शहर में हुए पलायन लोगों की व्यथा ने हर किसी को झकझोरा। गरीबी और सरकार की योजनाओं का हर आम व्यक्ति तक नहीं पहुंचने का कारण भी तो बढ़ती जनसंख्या ही है। कोविड को नियंत्रण करने में दूसरे देशों के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन भारत और दूसरे देशों की जनसंख्या पर तुलना कीजिए। आज भारत जिन संसाधनों  के साथ काम कर रहा है, वह दूसरे देशों से मजबूत होंगे, लेकिन हमारे यहां की जनसंख्या ही इतनी है कि व्यवस्थाएं बनने से पहले ही बिगड़ जाती है। विशाल जनसंख्या में भरण-पोषण करना ही हमारे सामने बड़ा प्रश्न चिन्ह है। मतलब, हम कोविड जैसी आपदा से भी समझ सकते है कि जनसंख्या का बढ़ना देश के लिए कितना खतरनाक है।
यदि हम आंकड़ों की बात नहीं भी करे तो भी जनसंख्या नियंत्रण देश के बिगड़े हालातों को सुधारने  लिए जरूरी है। इसके लिए देश के हर नागरिक को आगे आना होगा। यह देशहित के सहित परिवार का हित भी साधेगा। गरीबी, भूखमरी, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी जैसी गतिविधियों की रोक भी जनसंख्या कम होने पर ही रुक सकती है। आज देश में गरीबी रेखा जैसे शब्द जो इजाद हुए है, उसके लिए जिम्मेदार भी हम स्वयं ही है। सीमित परिवार से ही आदर्शों की परिकल्पना का निर्माण हो सकता है। भविष्य में बढ़ता बोझ कम करने के लिए आमजन को जागरूक होना पड़ेगा। यदि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो फिर सरकार को कठोर कानून के लिए अपने कदम बढ़ाने होंगे। फिर हमें ही यह तानाशाही रवैया नजर आने लगेगा। 
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-  अमित शाह





शनिवार, 30 मई 2020

विश्व तंबाकू निषेध दिवस : धूम्रपान को फैशन बना दिया, नए युग की करनी होगी शुरुआत



आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है। यह दिवस इसलिए महत्वपूर्ण नहीं की यह एक निर्धारित दिन है। इस दिवस के मायने बहुत बड़े है। इस दिवस की सार्थकता समझ ले तो यह जीवन के लिए नया वरदान साबित हो सकता है। नई पीढ़ी के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सकता है। लेकिन इसके लिए ठोस सोच के साथ सकारात्मक पहल जरूरी है। हमारे रास्ते में यदि कुआं जाए तो हम उस कुएं के किनारे से चलकर आगे की ओर बढ़ेंगे। कोई भी ऐसा नहीं होगा कि वह सीधा चलता जाए और कुएं में अपना जीवन समाप्त कर दें। यहीं बात आज के इस मुद्दे पर लागू होती है। धूम्रपान यानी तंबाकू एक प्रकार का जहरीला कुआं है। यह एक ऐसी दर्द भरी कहानी लिखता है कि जीवन तड़पतड़प कर समाप्त होता है। लेकिन फिर भी आज का यूथ हो या कोई उम्रदराज। इस जहर को छोड़ नहीं पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह फैशन है। आज तंबाकू का सेवन और धूम्रपान भी फैशन की तरह हो गया है। यह एक ऐसा फैशन है जो स्वयं के साथ परिवार की आशाओं को भी धूमिल करता है। लेकिन फिर भी ना समझी की तरह इसे स्वीकार किया जाता है।


जब कोई ओहदे वाला व्यक्ति इस ओर आकर्षित रहता है तो उसे देखकर चार और सीख लेते है। भारतीय दृष्टि में असल मायने देखे तो यहीं है कि यहां के बड़े व्यक्तित्व ने इस ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध क्यूं नहीं लगाती उसकी समीक्षा तो सरकार पर छोड़ देनी चाहिए। लेकिन, हमें क्या करना है यह हमें ही सोचना होगा। बॉलीवूड की पेजी थ्री पार्टी हो या फिल्मांकन उसमें भी धूम्रपान को तवज्जो मिली है। आप टीवी के पूरे पर्दे पर उठता हुआ धूआं का प्रसारण कर रहे हो और नीचे चार शब्दों में लिख रहे हो कि धूम्रपान और शराब सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि इतना ही हानिकारक है तो यह दिखाने की जरूरत क्यों है। कलाकारों को अब ऐसे दृश्यों का विरोध करना चाहिए। सेंसर बोर्ड को भी ऐसे दृश्यों को रोकने की अपील करनी चाहिए। ऐसे उत्पादों के विज्ञापन पर भी रोक लगनी ही चाहिए। क्योंकि अधिकतर युवा ऐसे प्रभावित करने विज्ञापन और दृश्यों से अपना फैशन बना लेता है।
भारत के युवाओं में बढ़ते नशे को रोकने के लिए एक सकारात्मक पहल की जरूरत है। यदि युवा रुका तो वह दूसरों को भी जरूर रोकेगा। देश की बढ़ती तंबाकू चलन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए नए युग की शुरुआत जरूरी है। इसके लिए आर्थिक दृष्टि को भी पीछे छोड़ना पड़े तो उसमें कोई बुराई नहीं होगी।

- अमित शाह