शनिवार, 30 मई 2020

विश्व तंबाकू निषेध दिवस : धूम्रपान को फैशन बना दिया, नए युग की करनी होगी शुरुआत



आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस है। यह दिवस इसलिए महत्वपूर्ण नहीं की यह एक निर्धारित दिन है। इस दिवस के मायने बहुत बड़े है। इस दिवस की सार्थकता समझ ले तो यह जीवन के लिए नया वरदान साबित हो सकता है। नई पीढ़ी के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सकता है। लेकिन इसके लिए ठोस सोच के साथ सकारात्मक पहल जरूरी है। हमारे रास्ते में यदि कुआं जाए तो हम उस कुएं के किनारे से चलकर आगे की ओर बढ़ेंगे। कोई भी ऐसा नहीं होगा कि वह सीधा चलता जाए और कुएं में अपना जीवन समाप्त कर दें। यहीं बात आज के इस मुद्दे पर लागू होती है। धूम्रपान यानी तंबाकू एक प्रकार का जहरीला कुआं है। यह एक ऐसी दर्द भरी कहानी लिखता है कि जीवन तड़पतड़प कर समाप्त होता है। लेकिन फिर भी आज का यूथ हो या कोई उम्रदराज। इस जहर को छोड़ नहीं पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह फैशन है। आज तंबाकू का सेवन और धूम्रपान भी फैशन की तरह हो गया है। यह एक ऐसा फैशन है जो स्वयं के साथ परिवार की आशाओं को भी धूमिल करता है। लेकिन फिर भी ना समझी की तरह इसे स्वीकार किया जाता है।


जब कोई ओहदे वाला व्यक्ति इस ओर आकर्षित रहता है तो उसे देखकर चार और सीख लेते है। भारतीय दृष्टि में असल मायने देखे तो यहीं है कि यहां के बड़े व्यक्तित्व ने इस ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध क्यूं नहीं लगाती उसकी समीक्षा तो सरकार पर छोड़ देनी चाहिए। लेकिन, हमें क्या करना है यह हमें ही सोचना होगा। बॉलीवूड की पेजी थ्री पार्टी हो या फिल्मांकन उसमें भी धूम्रपान को तवज्जो मिली है। आप टीवी के पूरे पर्दे पर उठता हुआ धूआं का प्रसारण कर रहे हो और नीचे चार शब्दों में लिख रहे हो कि धूम्रपान और शराब सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यदि इतना ही हानिकारक है तो यह दिखाने की जरूरत क्यों है। कलाकारों को अब ऐसे दृश्यों का विरोध करना चाहिए। सेंसर बोर्ड को भी ऐसे दृश्यों को रोकने की अपील करनी चाहिए। ऐसे उत्पादों के विज्ञापन पर भी रोक लगनी ही चाहिए। क्योंकि अधिकतर युवा ऐसे प्रभावित करने विज्ञापन और दृश्यों से अपना फैशन बना लेता है।
भारत के युवाओं में बढ़ते नशे को रोकने के लिए एक सकारात्मक पहल की जरूरत है। यदि युवा रुका तो वह दूसरों को भी जरूर रोकेगा। देश की बढ़ती तंबाकू चलन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए नए युग की शुरुआत जरूरी है। इसके लिए आर्थिक दृष्टि को भी पीछे छोड़ना पड़े तो उसमें कोई बुराई नहीं होगी।

- अमित शाह

रविवार, 28 अप्रैल 2019

लू लगने से मृत्यु क्यों होती है ?



हम सभी धूप में घूमते हैं फिर कुछ लोगों की ही धूप में जाने के कारण अचानक मृत्यु क्यों हो जाती है ?

👉 हमारे शरीर का तापमान हमेशा 37° डिग्री सेल्सियस होता है, इस तापमान पर ही हमारे शरीर के सभी अंग सही तरीके से काम कर पाते है ।

👉 पसीने के रूप में पानी बाहर निकालकर शरीर 37° सेल्सियस टेम्प्रेचर मेंटेन रखता है, लगातार पसीना निकलते वक्त भी पानी पीते रहना अत्यंत जरुरी और आवश्यक है ।

👉 पानी शरीर में इसके अलावा भी बहुत कार्य करता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने पर शरीर पसीने के रूप में पानी बाहर निकालना टालता है । (बंद कर देता है )

👉 जब बाहर का टेम्प्रेचर 45° डिग्री के पार हो जाता है और शरीर की कूलिंग व्यवस्था ठप्प हो जाती है, तब शरीर का तापमान 37° डिग्री से ऊपर पहुँचने लगता है ।

👉 शरीर का तापमान जब 42° सेल्सियस तक पहुँच जाता है तब रक्त गरम होने लगता है और रक्त में उपस्थित प्रोटीन पकने लगता
है ।

👉  स्नायु कड़क होने लगते हैं इस दौरान सांस लेने के लिए जरुरी स्नायु भी काम करना बंद कर देते
हैं ।

👉 शरीर का पानी कम हो जाने से रक्त गाढ़ा होने लगता है, ब्लडप्रेशर low हो जाता है, महत्वपूर्ण अंग (विशेषतः ब्रेन) तक ब्लड सप्लाई रुक जाती है ।

👉 व्यक्ति कोमा में चला जाता है और उसके शरीर के एक-एक अंग कुछ ही क्षणों में काम करना बंद कर देते हैं, और उसकी मृत्यु हो जाती है ।

👉गर्मी के दिनों में ऐसे अनर्थ टालने के लिए लगातार थोड़ा-2 पानी पीते रहना चाहिए और हमारे शरीर का तापमान 37° मेन्टेन किस तरह रह पायेगा इस ओर  ध्यान देना चाहिए ।



Equinox phenomenon: इक्विनॉक्स प्रभाव आने वाले दिनों में भारत को प्रभावित करेगा ।

कृपया 12 से 3 बजे के बीच घर, कमरे या ऑफिस के अंदर रहने का प्रयास करें ।

तापमान 40 डिग्री के आस पास विचलन की अवस्था मे रहेगा ।

यह परिवर्तन शरीर मे निर्जलीकरण और सूर्यातप की स्थिति उत्पन्न कर देगा ।

(ये प्रभाव भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर सूर्य चमकने के कारण पैदा होता है) ।

कृपया स्वयं को और अपने जानने वालों को पानी की कमी से ग्रसित न होने दें ।

किसी भी अवस्था में कम से कम 3 लीटर पानी जरूर पियें । किडनी की बीमारी वाले प्रति दिन कम से कम 6 से 8 लीटर पानी जरूर लें ।

जहां तक सम्भव हो ब्लड प्रेशर पर नजर रखें । किसी को भी हीट स्ट्रोक हो सकता है ।

ठंडे पानी से नहाएं । इन दिनों मांस का प्रयोग छोड़ दें या कम से कम
करें ।

फल और सब्जियों को भोजन मे ज्यादा स्थान दें ।

हीट वेव कोई मजाक नही है ।

एक बिना प्रयोग की हुई मोमबत्ती को कमरे से बाहर या खुले मे रखें, यदि मोमबत्ती पिघल जाती है तो ये गंभीर स्थिति है ।

शयन कक्ष और अन्य कमरों मे 2 आधे पानी से भरे ऊपर से खुले पात्रों को रख कर कमरे की नमी बरकरार रखी जा सकती है ।

अपने होठों और आँखों को नम रखने का प्रयत्न करें ।

जनहित में इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित कर अपना और अपने जानकार लोगों का भला
करें ।

- साभार।

सोमवार, 25 मार्च 2019

प्री-वेडिंग वीडियो शूट, सोशल मीडिया पर उगलता जहर, दिखावे के लिए पनप रही पाश्चात्य संस्कृति


प्री-वेडिंग वीडियो और फोटो शूट का चलन इन दिनों बढ़ गया है। प्री-वेडिंग शूट शहरों से अब ग्रामीण परिवेश में भी अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रहा है। पाश्चात्य संस्कृति को मिल रहा बढ़ावा भारतीय संस्कृति के लिए खतरा तो है ही साथ ही सामान्य परिवारों के लिए एक चुनौती भी। आर्थिक रूप से मजबूत परिवार अपने दिखावों के लिए एक अलग ही संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं। बढ़ते प्री-वेडिंग ट्रेड से आजकल आधा भारत चिंतित भी नजर आ रहा है, लेकिन उनके आसपास ही पैर पसार रही पाश्चात्य संस्कृति में वह भी अपने आप को समायोजित करने में पीछे नहीं हट रहा। आजकल सोशल मीडिया पर प्री-वेडिंग का िवरोध ऐसे ही बढ़ा है जैसे इसका चलन। आजकल हर व्यक्ति अपना अलग तरीके से प्रजेंटेशन देना चाहता है। खुद को अलग साबित करने के लिए प्री-वेडिंग भी एक हिस्सा है।
अब समाज में यह बहस छीड़ रही है कि क्या वाकय में शादी से पहले पति-पत्नी का अन्य शहरों में जाकर शूट करवाना सही है। शादियांे में बॉलीवुड तड़के के बीच प्री-वेडिंग का प्रसारण हमारी संस्कृति और समाज को किस स्तर तक पहुंचाएगा। बहस हो रही है, लेकिन यह बहस सिर्फ चंद मिनटों में ही सीमट रही है। क्योंकि प्री वेडिंग वहीं परिवार करवा रहे है जो समाज में प्रतिष्ठित और आर्थिक रूप से सुदृढ़ है। 

दूसरी बात यह है कि प्री-वेडिंग की शुरुआत सिर्फ इसलिए की गई थी ताकी शादी से पहले जोड़े फ्रेंडली बन जाए। एक-दूसरे को पहचान ले। लेकिन अब इसका यह रूप विकराल ले रहा है। विकराल का मतलब भयानक नहीं है। लेकिन, यह भारतीय संस्कृति के लिए कठोरघात रूप ही है। दिल्ली में तो अब इसके लिए स्टूडियो तक बन रहे हैं। ताकी कपल को दूसरे शहरों में नहीं जाना पड़ा और स्टूडियो में ही अलग-अलग लोकेशन की शूट एक जगह ही हो सके। अब यह शूट फिल्मो की तरह भी होने लगे है, जैसे पहली बार कैसे मिलना हुआ, किस तरह प्रपोज किया वगैरह, वगैरह।  फिर इस फिल्म को रिसेप्शन में बताया जाता है। यह फिल्म कितनी हिट या फ्लॉप रही यह तो वह स्वयं ही आंकलन कर सकते है, लेकिन इससे भारतीय संस्कृति के पक्षकार जरूर असहज महससू करने लगे है।
हालांकि यह बात तो तय है कि पाश्चात्य संस्कृति अब भारत में कई गुणा अपने पैर पसार चुकी है। बदलते परिवेश और हालात से ही आजकल रिश्तों में भी खटास बढ़ी है। हर कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहता है। चाहेगा क्यों भी नहीं। मैं भी समर्थित हूं। हमें अपनी जिंदगी को जीने के लिए दूसरों के विचारों का बोझ उठाने की जरूरत नहीं है। लेकिन, हमें यह भी तो तय करना होगा कि हम अपनी जिंदगी को आसान बनाने के लिए कहीं समाज को तो बर्बादी पर नहीं पहुंचा रहे हैं। क्योंकि समाज ही एक ऐसा दायरा है, जिससे संगठित होने के सबूत मिलते है।
देश की समाजाें में लगातार बदल रहे नियमों की वजह हर सामाजिक प्राणी है। क्योंकि नियम सिखाने वालो अपनी बारी आते ही वह नियम घर के एक कोने में टांग लेते है। नियमों को िसर्फ उन लोगों पर थोपा जाता है जो समाज में सुख और आनंद से जिंदगी जीना चाहते है। क्योंकि साधारण व्यक्तित्व हम कमजोर समझते है। हालांकि प्री वेडिंग को भारतीय संस्कृति के कुछ पक्षकार भी स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन उनका मत है कि आजकल कई बार देखा गया है कि अंतिम समय में सगाई टूटना या शादी के कुछ ही समय बाद वापस अलग हो जाना आमबात हो गई है। इस स्थिति में प्रीवेडिंग नकारात्मक हो सकती है। इसीलिए इसका विरोध भी इन दिनों सोशल मीडिया के माध्यम से बढ़ गया है। 

- अमित शाह