बुधवार, 22 मार्च 2023

अग्निपथ से संविदा में होने वाली भर्तियों के लिए भी विकल्प खुला

अग्निपथ योजना आज देश का सबसे अहम मुददा बन चुका है। हम यहां पर यह बात नहीं करेंगे की यह योजना कितनी कारगर है या कितनी विफल। योजनाओं सफल रूप देने के लिए ही बनाई जाती है। कई बार विफलता मिलती है तो बहुत सारी सीख भी दे जाती है। जिसका भविष्य मंे फायदा जरूर मिलता है। 

अग्निपथ योजना को देखकर लगता है कि संविदा पर होने वाली भर्तियों के लिए भी विकल्प खुलता है। सरकार संविदा पर भर्तियां करती है। जिसमें कई पदों पर युवा अत्यंत कम वेतन में जीवनयापन करता है। वह नियमित की आस में जिंदगी पूरी खफा देता है। उम्मीद और आशाओं को लेकर वह जीता है, लेकिन जब वृद्धावस्था में पहुंचता है तो उसके हालात बदत्तर हो जाते है। बदत्तर इसलिए कि वह उसके वेतन में सिर्फ परिवार का पालन कर सका, लेकिन वह इतना भी बचा नहीं पाया कि वृद्धावस्था में अपने स्वयं को पाल सके। संविदाकर्मी काम तो सरकार का करते हैं, लेकिन उन्हें हमेशा यही याद दिलाया जाता है कि वह ठेके पर है।

संविदाकर्मियों के संगठन इसी मायने में नियमितिकरण और वेतनमान को लेकर बार-बार धरने-प्रदर्शन को मजबूर होते है। कई बार नियमितिकरण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन हो चुका है। राजस्थान में तो एक दशक पहले पुलिस को संविदाकर्मियों के पीछे घोड़े तक दौड़ाने पड़ गए थे। ऐसे हालातों से बचने के लिए अग्निपथ की तरह ही विकल्प खुला हुआ दिखाई देता है। अग्निपथ के नियम की तरह यदि सरकारें संविदाकर्मियों के लिए भी नियम लागू करे तो इसका स्वागत हर युवा करेगा। क्योंकि यह भविष्य को बांधकर नहीं रखता। एक अच्छे अनुभव से वाकीब कराकर जीवन में उन्नति के अवसर भी पैदा करता है। 

एक संविदाकर्मी के लिए भी होना चाहिए कि पक्के नियम बने। उसका कार्यकाल शॉर्ट टर्म के लिए तय होना चाहिए। वेतनमान सम्मानजनक होनी चाहिए। वहीं शॉर्ट टर्म के बाद उन्हें भी एक निश्चित राशि देनी चाहिए। ताकी वह अपने भविष्य के लिए स्वयं का भी रोजगार शुरू कर सके। अभी कोई निश्चित नियम नहीं होने से वह ना तो नौकरी छोड़ पाते है ना ही चल रही नौकरी से जीवनयापन कर सकते है। संविदाकर्मियों को भी भर्तियों में 25 फीसदी तक आरक्षण दिया जा सकता है। जिससे शॉर्ट टर्म में नौकरी करने के लिए भी टेलेंटेड युवा आगे आएगा। 


व्यक्तिगत मामलों में तुलनात्मक अध्ययन छोड़ दीजिए, शायद आप या कोई गलत कदम उठाने से बच जाए

तुलना और महत्वकांक्षा, यदि कोई सीमा से ज्यादा कर ले तो अंत बुरा होता है। हालांकि हर माहौल में यह बात सत्य नहीं लगती। लेकिन, हमारी लाइफ स्टाइल और पढ़ाई में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। तुलना और महत्वकांक्षा हमारे स्वयं की अन्य से और हमारी हमारे चाहने वालों की हो सकती है। हर व्यक्ति की अपनी पहचान होती है। कोई पढ़ाई में अव्वल है तो काई खेल में। कोई लिखने में अच्छा होता है तो काई बोलने में। हर व्यक्ति सभी विशेषताओं को समेट नहीं होता है। हमें हमारी काबिलियत और हमारी रूचि अनुसार ही आगे बढ़ने के प्रयास करने चाहिए। हम दूसरों को देखकर अपने लक्ष्य तय करेंगे तो संभव है हमें निराशा हासिल हो। कई बार यह निराशा अपने विचारों पर इतनी हावी हो जाती है कि हम कठोर गलत निर्णय ले लेते हैं। यहीं कारण है आज आत्महत्याओं के केस बढ़ रहे हैं। महत्वकांक्षाएं बढ़ा दी। स्वयं की तुलना अन्य से करने लगे। वहीं युवा जिंदगियां भी आत्महत्याओं के कारण तबाही देख रही है। उंचाइयां हर किसी को पसंद है, लेकिन सब आसानी से मिलना भी संभव नहीं है। विफलताएं अक्सर सफलताओं में तब्दिल की जा सकती है। लेकिन प्रयास जरूरी होते है।

हमें कई किस्से ऐसे मिल जाएंगे की दसवीं और बारहवीं फेल होने वाले भी आज सफल लोगों में शामिल है। यदि वह एक बार फेल होने से अपना जीवन समाप्त कर देते तो क्या होता। अवसर हमारे पास आते रहेंगे। अब किसी एक अवसर को सफलता में बदलना होता है। इसलिए विफलताओं पर डरना कायरता का प्रतीक है। पहली बात तो यह है कि हमें हमारी क्षमताओं को पहचान कर आगे बढ़ना है। दूसरी बात महत्वकांक्षाएं भी एक हद तक ही तय की जाए तो जिंदगी जीने के लिए बेहतर है।

एनसीआरबी द्वारा जारी 2021 की रिपोर्ट कहती है कि आत्महत्या से जान देने वालों की संख्या एक साल में 8 लाख है। जिसमें से 20 फीसदी भारतीय है। पिछले वर्ष 1 लाख 64 हजार लोगों ने अपनी स्वयं की जान ले ली। इसके पीछे रिपोर्ट में कॅरिअर, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, व्यसन शराब, वित्तीय नुकसान जैसे कारण बताए है। इन सभी कारणों पर गौर करें तो यहां महत्वकांक्षा और तुलना दोनों चीजें काम करती है। महत्वकांक्षा में हम ऐसा कदम उठा देते है कि जिसका परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहता और हम गलत कदम उठाने के लिए तैयार हो जाते है।  

- अमित शाह

 

हर छोटे कदम से शुरू होता है सफलता का सफर, स्वच्छता हो या समाज शुरूआत स्वयं से जरूरी

12 दिसंबर 2016 को मैं एक खास मुलाकात को लेकर पहली बार इंदौर पहंुचा था। वहां जाते ही सबसे पहले दैनिक भास्कर की एक प्रति खरीदी। पहली खबर थी इंदौर भारत में सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा हासिल कर चुका है। मन में ख्याल आया कि इतना बड़ा शहर इस प्रकार का खिताब कैसे जीत सकता है। स्वच्छता को बनाए रखना कितना मुश्किल होता है इतने बड़े शहर के लिए। लेकिन, जब शहर को देखा तो ऐसा लगा कि काम तो हुआ है। फिर सौभाग्य से मेरा विवाह भी इंदौर में ही हुआ। यहां पर मुझे मेरे हमसफर ने यह साबित कर दिया कि इंदौर की स्वच्छता का राज वहां रहने वाला वह हर नागरिक है, जो इंदौर को स्वच्छ रखना चाहता है। मैं शादी के बाद जब पहली बार इंदौर से राजस्थान बस में आ रहा था। रास्ते में हमने एक होटल से नाश्ता लिया और हमारी सीट पर बैठ गए। जब हमने नाश्ता कर दिया तो मैं नाश्ते की प्लेट रास्ते में फेंकने लगा। मेरी पत्नी ने मुझे टोका और फेंकने नहीं दिया। मैंने कहा-रात है, अभी कौन देख रहा है। लेकिन, उसने प्लेट फेंकने की अनुमति नहीं दी। जब तक अगला स्टेशन आया तब तक मैं प्लेट लेकर ही बैठा रहा। फिर अगले स्टेशन पर मुझे उसने कहा अब जाओ और डस्टबीन में डालकर आओ। 

स्वच्छता का यह वाकया साबित करता है कि कोई भी बड़ी सफलता के लिए हर छोटा कदम उपयोगी होता है। साथ ही सामुहिक सफलता के लिए शुरूआत स्वयं से करनी जरूरी होती है। यह वाकया हमें सुनने में जरूर मामूली सा लगता होगा, लेकिन यह बात तय है कि जब तक हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझेगा, तब ही हम सफल हो पाएंगे। इसी वजह से आज इंदौर छठीं बार सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा हासिल कर चुका है। देश की प्रगति भी इसमें ही निहित है। यह जरूरी नहीं कि यह नियम हम किसी सामुहिक कार्य के लिए अमल में लाए, यह स्वयं के बदलाव को लेकर भी एक जरूरी सिद्धांत है।

आज के परिप्रेक्ष्य में यह बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि देश में कई ऐसे मामले है, जिसमें सलाह दी जाती है, लेकिन स्वयं इसकी पालना नहीं करते है। नतीजन वह बातें सिर्फ भाषणों और सोशल मीडिया पर अच्छी लगती है, लेकिन वास्तविकता में इसका कोई औचित्य नहीं रहता। आज स्वच्छता की बात कर रहे हैं तो मैं सबसे पहले सरकारी अस्पतालों की ओर रूख करूंगा। सरकारी महकमा अपने अस्पताल को स्वच्छ रखने के लिए कई प्रकार के जतन करता है। लेकिन, सफलता आशानुरूप नहीं मिल पाती है। फिलहाल कई अस्पतालों में बदलाव आए है, लेकिन बड़े स्तर के सरकारी अस्पतालो में जगह-जगह गंदगी और गुटखांे के पीक मिल जाएंगे। यह सामान्य सी बात है। इसमें हर बार अस्पताल प्र्रशासन को कटघरे में लिया जाता है। लेकिन इसके लिए सभी के प्रयास जरूरी है। यदि अस्पताल में आने वाला व्यक्ति यह सोच ली की मैं स्वच्छता के लिए नियमों की पालना करूंगा। इस परिसर में धूम्रपान नहीं करूंगा तो अपने आप ही स्थिति सुधर जाएगी। एक दिन वह भी आएगा कि हमें स्वच्छता के लिए ढोल नहीं पीटना पड़ेगा। निजी अस्पतालों में जहां नियमों की पालना सख्ती से होती है वहीं सरकारी व्यवस्था में ऐसा नहीं हो पाता है।  

- अमित शाह

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

नैतिक शिक्षा का पतन और आदर्शों में बदलाव से युवा निभा रहे विलेन का रोल

एक वक्त था, जब एक विद्यार्थी के आदर्श भीमराव अंबेडकर, महात्मा गांधी, एपीजे अब्दुल कलाम, सुभाषचंद्र बोस जैसे महान व्यक्तित्व थे। लेकिन अब इनकी जगह सिनेमाई कलाकारों ने ले ली। देश में बढ़ते क्राइम में युवाओं की लिप्तिता यही इशारा करती है। आज कई बड़ी घटनाएं मौज-शौक के लिए होती है। जिंदगी के दिखावे के लिए युवा ऐसे कदम अंगीकार कर लेता है कि उसका परिणाम वह स्वतः भी नहीं जान पाता। नतीजन समाज में एक विलेन की भूमिका अदा हो जाती है। 

देश में लगातार बढ़ी रही वारदाताओं के पीछे हमारे नैतिक मूल्यों का पतन भी है। हमारी शिक्षा पद्वती में भी नैतिक मूल्यों को विलुप्त कर दिया। नैतिक शिक्षा को हल्के में इसलिए लिया गया, क्योंकि हमारे सिस्टम ने इस विषय को कभी अंक प्रणाली में नहीे जोड़ा। बच्चा जब बढ़ा होता है तो वह जो देखता है, वहीं सीखता है। यदि हम करेला दिखाएंगे तो कड़वाहट महसूस करेगा। आईसक्रीम दिखाएंगे तो वह मिठास का अनुभव करेगा। 

समाज में रेप जैसे मामले बढ़ रहे हैं। कठोर कानून का असर भी नहीं हो रहा है। रेप के मामले तभी रूक सकते हैं जब सामाजिक विचारधार एक आंदोलन के रूप में उभर कर आए। ऐसे मामलों को रोकने के लिए नैतिक मूल्यों का होना अत्यंत आवश्यक है। यह नैतिक मूल्य तभी विकसित हो सकेंगे, जब हम जन्म से लेकर बालिग होने तक उसे देंगे। काफी हद तक युवाओं में विलेन का रोल बढ़ाने में हमारा कंटेंट रहा है। सोशल मीडिया और टेलीविजन ने टीआरपी की आड़ में ऐसा कंटेंट परोसा है कि युवाओं का माइंड वॉश हो रहा है। वह हाई प्रोफाइल में अपने आप को देखना चाहता है, इस वजह से वह अपनी हदें पार कर लेता है। समाज को भी अपनी बेटों-बेटियों के प्रति विचारधारा में बदलाव करना होगा। यहीं बदलाव वारदात करने से रोक सकेगा। हमने हमेशा बेटियों की अपेक्षा की है। बेटियों को महज वंश को बढ़ाने की विचारधार के समकक्ष रखा है। जिस वजह से युवाओं में भी बेटियों प्रति भेदभाव की मानसिकता पनपी है।

सामाजिक विचारधारा को बदलने के लिए संचार क्रांति लानी आवश्यक है। समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के लिए परोसे जाने वाला कंटेंट बदलना होगा। आज स्थितियां ऐसी हो गई है कि बालिग के लिए बनाया जाने वाला कंटेंट किशोर भी देख रहा है। क्योंकि उसे रोकने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। यानी फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्य बालिग के साथ ही नाबालिग भी देख रहा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने सिर्फ औपचारिकता निभाई है। फिल्म निर्माता एक चेतावनी लिखकर स्वतंत्र हो जाते हैं। लेकिन भविष्य पर पड़ने वाले इसके असर का कोई जिम्मेदार नहीं होता है। 

वर्तमान में अधिकांश युवा अपने आदर्श अभिनेताओं को मानने लगे है। जबकि वह महज कलाकार है। किरदार नहीं है। जब हम किरदार की जगह कलाकार को आदर्श मानने लगेंगे तो हमारी नैतिकता का डूबना तय है। ‘पुष्पा: द राइज’  इसका प्रमुख उदाहरण है। इस फिल्म ने युवा दिल में छाप छोड़ी है। लेकिन, क्या यह नैतिकता के नाते सही है। एक तस्कर को उभरता हुआ सितारा बताना कहां उचित है। फिल्म में विलेन को दूसरों के लिए आदर्श दिखाने की कोशिश की है। यह कंटेंट हमारे समाज को कहां ले जाएगा। यह विचारणीय ही नहीं बल्की इस देश का बड़ा मुददा है। 
- अमित शाह 

स्किल बढ़ाने के लिए औद्योगिक घरानों में सीधी नियुक्ति हो, सरकार सहयोग देकर कर सकती है प्रोत्साहित


हाल ही में सरकार की एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि स्किल इंडिया के तहत प्रशिक्षण लेने और रोजगार पाने वालों में भारी गिरावट आई है। राज्यों ने इसे भले कोरोना की वजह मानी हो, लेकिन युवाओं में स्किल बढ़ाने के लिए सरकार को अब ऐसी योजनाओं के प्रारूप को बदलने की जरूरत है। सरकार स्वयं प्रशिक्षण देने के बजाए जरूरतमंद युवाओं को सीधे देश के औद्योगिक घरानों से जोड़ सकती है। इससे काम भी ईमानदारी से होगा और प्रशिक्षण के मायने भी सही साबित होंगे। फिलहाल स्किल बढ़ाने के लिए राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, सभी स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ समझौता कर युवाओं को प्रशिक्षण देने का काम कर रही है। फिर रोजगार के लिए अलग से मशक्कत करनी पड़ती है। यदि प्रशिक्षण ही औद्योगिक घरानों से शुरू हो तो इसका डबल फायदा मिलेगा। जहां प्रशिक्षण दिया जा रहा है, वहीं पर रोजगार का अवसर मिल सकता है। इसमें से यह तय है कि जो भी अपनी स्किल को उस कपंनी की जरूरत के अनुसार बढ़ाएगा वह सबसे पहले वहां स्थायी रोजगार पाने का हकदार बन जाएगा। इसके लिए सरकार को ऐसी स्किम लान्च करनी चाहिए कि वह प्रशिक्षण के लिए उस औद्योगिक क्षेत्र को सहयोग करें। प्रशिक्षण की निश्चित अवधि तय कर उस दौरान सरकार फंड औद्योगिक घरानों को अदा करें। ताकी निजी कंपनियां भी खुशी-खुशी बेरोजगारों को प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हो जाएगी।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में यह बताया गया है कि दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना में पिछले चार साल में 90 फीसदी तक गिरावट आई है। यह आंकड़े वाकई चौकाने वाले है। एक तरफ जहां बेरोजगारी चरम पर है, वहीं दूसरी ओर प्रशिक्षण के रूझान में कमी दिख रही है। इसमें दो बातें सामने आती है। पहली या तो युवाओं को इन प्रशिक्षणों के माध्सम से रोजगार के अवसर की उम्मीद नहीं है। दूसरा यह हो सकता है कि इन प्रशिक्षणों की क्वालिटी युवाओं को रास नहीं आ रही हो। हालांकि यह महज कयास है। क्योंकि सरकार ने इसे कोरोना की वजह माना है। 

असल में जो भी हो, लेकिन अब ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन पर मंथन करना जरूरी है। यहां हम सिर्फ दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना की बात नहीं कर रहे, बल्की उन तमाम योजनाओं के बारे में मंथन आवश्यक है जो रोजगार के अवसर पैदा करने में सहायक है। औद्योगिक घराने प्रशिक्षित कार्मिकों की मांग इसलिए करते है ताकी वह उनक कार्मिक का उपयोग पहले दिन से ही कर सके। वह आउटपुट देखना चाहते है। इस क्षेत्र में प्रशिक्षण देने का वक्त नहीं है। क्योंकि कोई भी निजी क्षेत्र व्यर्थ का वेतन देना नहीं चाहेगा। इसलिए सरकार यदि प्रशिक्षण निजी औद्योगिक घरानों में ही कराने की व्यवस्था करें तो बेहतर हो सकता है। इससे कार्यक्रम की क्वालिटी भी बनी रहेगी।