गुरुवार, 23 मार्च 2023

कोविड़-19 ने हमें समर्पण का भाव दिया, सहयोग और सेवा का हमेशा साक्षी रहा हैं वागड़

कोविड़ – 19 ने जहां आम से लेकर उच्च पदों पर आसीन लोगों को भी प्रभावित किया, वहीं उसके दूसरे पहलू में कई फायदें भी दिखे। हालांकि महामारी, महामारी ही है। इससे जीवन खासा प्रभावित हुआ। लेकिन, फिर भी सकारात्मक सोच को अपनाना कोई गुनाह नहीं होगा। कई बार विपदाएं ही आविष्कार की जननी बनती है। समस्या आने पर ही इसके समाधान के लिए एक नई खोज विकसित होती है। कोविड़ के दौरान यह देखा भी गया है। भारत में आज वेक्सीनेशन का दौर चल रहा हैं। विदेशों में भारत की साख बढ़ी है। कोविड़ में भारत ने अन्य देशो में वेक्सीन पहुंचाकर यह भी साबित किया कि हम जो कहते हैं, उसे करने की क्षमता भी रखते हैं।

इस संदर्भ में हम आम लोगों की जिंदगी में झांककर देखे तो नजर आएगा कि इस बुरे दौर में भी सहयोग के लिए हाथ आगे बढ़े हैं। संगठन और समाज ने अपने स्तर पर इस काल में जुझ रहे लोगों को सहयोग करने का प्रयास किया है। हम वागड़ क्षेत्र की ही बात करे तो यह अहसास होगा कि यहां पर सहयोग और समाजसेवा की जो भावना थी, वह अब कई गुणा ज्यादा विकसित हो चुकी है। लॉकडाउन जैसे हालातों में भी लागों ने दाना-दाना इकट्ठा कर गरीबों का सहयोग किया। कई परिवारों ने अपनी कम आमदनी पर भी सहयोग का सिलसिला जारी रखा। यह तभी संभव था, जब हृदय में सहयोग करने की भावना जागृत हुई हो।

महामारी ने अपने पैर हर गांव में फैलाएं। इससे कोई अछूता नहीं है। कोई बीमारी से प्रभावित हुआ तो कोई आर्थिक रूप से। हालात ऐसे बन गए कि परिवार वाले ही एक-दूसरे से मिलने के लिए सौ बार सोचने लग गए। ऐसे हालातों में भी समाज सेवा के हाथ पीछे नहीं रहे। संगठनों ने घर-घर जाकर सहयोग किया। स्वयं की परवाह किए बिना लोग एक-दूसरे के सहयोग के लिए डटे रहे। इस काल में इन दृश्यों ने भावनाओं को बदला। सहयोग और समर्पण की भावना को गति मिली।

वागड़ धरा के परीप्रेक्ष्य में सहयोग और समर्पण पर चर्चा करना हितकर ही रहेगा। यहां वैसे भी धर्म और आस्था का भंडार, इस प्रकार है, जैसे मानों पूरा वागड़ एक ही परिवार है। हालांकि कुछ कमियां तो हर क्षेत्र में रहती हैं। लेकिन, फिर भी यहां पर समर्पण की भावना का पलड़ा भारी है। कोविड़ में एक बदलाव यह भी आया कि लोगों ने जीने का तरीका भी सीख लिया। प्राय:देखा गया कि लोग परिवार को छोड़कर जो भागमभाग करते थे, उसमें भी विराम लगा। परिवार की अहमियत बढ़ी। पाने की चाहत में हम बहुत कुछ खो देते है। महामारी ने यह भी सिखाया कि पाना ही सबकुछ नहीं है, जो हैं उसे संभालकर रखना  भी बड़ा काम है।   

बुधवार, 22 मार्च 2023

अग्निपथ से संविदा में होने वाली भर्तियों के लिए भी विकल्प खुला

अग्निपथ योजना आज देश का सबसे अहम मुददा बन चुका है। हम यहां पर यह बात नहीं करेंगे की यह योजना कितनी कारगर है या कितनी विफल। योजनाओं सफल रूप देने के लिए ही बनाई जाती है। कई बार विफलता मिलती है तो बहुत सारी सीख भी दे जाती है। जिसका भविष्य मंे फायदा जरूर मिलता है। 

अग्निपथ योजना को देखकर लगता है कि संविदा पर होने वाली भर्तियों के लिए भी विकल्प खुलता है। सरकार संविदा पर भर्तियां करती है। जिसमें कई पदों पर युवा अत्यंत कम वेतन में जीवनयापन करता है। वह नियमित की आस में जिंदगी पूरी खफा देता है। उम्मीद और आशाओं को लेकर वह जीता है, लेकिन जब वृद्धावस्था में पहुंचता है तो उसके हालात बदत्तर हो जाते है। बदत्तर इसलिए कि वह उसके वेतन में सिर्फ परिवार का पालन कर सका, लेकिन वह इतना भी बचा नहीं पाया कि वृद्धावस्था में अपने स्वयं को पाल सके। संविदाकर्मी काम तो सरकार का करते हैं, लेकिन उन्हें हमेशा यही याद दिलाया जाता है कि वह ठेके पर है।

संविदाकर्मियों के संगठन इसी मायने में नियमितिकरण और वेतनमान को लेकर बार-बार धरने-प्रदर्शन को मजबूर होते है। कई बार नियमितिकरण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन हो चुका है। राजस्थान में तो एक दशक पहले पुलिस को संविदाकर्मियों के पीछे घोड़े तक दौड़ाने पड़ गए थे। ऐसे हालातों से बचने के लिए अग्निपथ की तरह ही विकल्प खुला हुआ दिखाई देता है। अग्निपथ के नियम की तरह यदि सरकारें संविदाकर्मियों के लिए भी नियम लागू करे तो इसका स्वागत हर युवा करेगा। क्योंकि यह भविष्य को बांधकर नहीं रखता। एक अच्छे अनुभव से वाकीब कराकर जीवन में उन्नति के अवसर भी पैदा करता है। 

एक संविदाकर्मी के लिए भी होना चाहिए कि पक्के नियम बने। उसका कार्यकाल शॉर्ट टर्म के लिए तय होना चाहिए। वेतनमान सम्मानजनक होनी चाहिए। वहीं शॉर्ट टर्म के बाद उन्हें भी एक निश्चित राशि देनी चाहिए। ताकी वह अपने भविष्य के लिए स्वयं का भी रोजगार शुरू कर सके। अभी कोई निश्चित नियम नहीं होने से वह ना तो नौकरी छोड़ पाते है ना ही चल रही नौकरी से जीवनयापन कर सकते है। संविदाकर्मियों को भी भर्तियों में 25 फीसदी तक आरक्षण दिया जा सकता है। जिससे शॉर्ट टर्म में नौकरी करने के लिए भी टेलेंटेड युवा आगे आएगा। 


व्यक्तिगत मामलों में तुलनात्मक अध्ययन छोड़ दीजिए, शायद आप या कोई गलत कदम उठाने से बच जाए

तुलना और महत्वकांक्षा, यदि कोई सीमा से ज्यादा कर ले तो अंत बुरा होता है। हालांकि हर माहौल में यह बात सत्य नहीं लगती। लेकिन, हमारी लाइफ स्टाइल और पढ़ाई में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। तुलना और महत्वकांक्षा हमारे स्वयं की अन्य से और हमारी हमारे चाहने वालों की हो सकती है। हर व्यक्ति की अपनी पहचान होती है। कोई पढ़ाई में अव्वल है तो काई खेल में। कोई लिखने में अच्छा होता है तो काई बोलने में। हर व्यक्ति सभी विशेषताओं को समेट नहीं होता है। हमें हमारी काबिलियत और हमारी रूचि अनुसार ही आगे बढ़ने के प्रयास करने चाहिए। हम दूसरों को देखकर अपने लक्ष्य तय करेंगे तो संभव है हमें निराशा हासिल हो। कई बार यह निराशा अपने विचारों पर इतनी हावी हो जाती है कि हम कठोर गलत निर्णय ले लेते हैं। यहीं कारण है आज आत्महत्याओं के केस बढ़ रहे हैं। महत्वकांक्षाएं बढ़ा दी। स्वयं की तुलना अन्य से करने लगे। वहीं युवा जिंदगियां भी आत्महत्याओं के कारण तबाही देख रही है। उंचाइयां हर किसी को पसंद है, लेकिन सब आसानी से मिलना भी संभव नहीं है। विफलताएं अक्सर सफलताओं में तब्दिल की जा सकती है। लेकिन प्रयास जरूरी होते है।

हमें कई किस्से ऐसे मिल जाएंगे की दसवीं और बारहवीं फेल होने वाले भी आज सफल लोगों में शामिल है। यदि वह एक बार फेल होने से अपना जीवन समाप्त कर देते तो क्या होता। अवसर हमारे पास आते रहेंगे। अब किसी एक अवसर को सफलता में बदलना होता है। इसलिए विफलताओं पर डरना कायरता का प्रतीक है। पहली बात तो यह है कि हमें हमारी क्षमताओं को पहचान कर आगे बढ़ना है। दूसरी बात महत्वकांक्षाएं भी एक हद तक ही तय की जाए तो जिंदगी जीने के लिए बेहतर है।

एनसीआरबी द्वारा जारी 2021 की रिपोर्ट कहती है कि आत्महत्या से जान देने वालों की संख्या एक साल में 8 लाख है। जिसमें से 20 फीसदी भारतीय है। पिछले वर्ष 1 लाख 64 हजार लोगों ने अपनी स्वयं की जान ले ली। इसके पीछे रिपोर्ट में कॅरिअर, अलगाव की भावना, दुर्व्यवहार, हिंसा, पारिवारिक समस्याएं, मानसिक विकार, व्यसन शराब, वित्तीय नुकसान जैसे कारण बताए है। इन सभी कारणों पर गौर करें तो यहां महत्वकांक्षा और तुलना दोनों चीजें काम करती है। महत्वकांक्षा में हम ऐसा कदम उठा देते है कि जिसका परिणाम हमारे पक्ष में नहीं रहता और हम गलत कदम उठाने के लिए तैयार हो जाते है।  

- अमित शाह

 

हर छोटे कदम से शुरू होता है सफलता का सफर, स्वच्छता हो या समाज शुरूआत स्वयं से जरूरी

12 दिसंबर 2016 को मैं एक खास मुलाकात को लेकर पहली बार इंदौर पहंुचा था। वहां जाते ही सबसे पहले दैनिक भास्कर की एक प्रति खरीदी। पहली खबर थी इंदौर भारत में सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा हासिल कर चुका है। मन में ख्याल आया कि इतना बड़ा शहर इस प्रकार का खिताब कैसे जीत सकता है। स्वच्छता को बनाए रखना कितना मुश्किल होता है इतने बड़े शहर के लिए। लेकिन, जब शहर को देखा तो ऐसा लगा कि काम तो हुआ है। फिर सौभाग्य से मेरा विवाह भी इंदौर में ही हुआ। यहां पर मुझे मेरे हमसफर ने यह साबित कर दिया कि इंदौर की स्वच्छता का राज वहां रहने वाला वह हर नागरिक है, जो इंदौर को स्वच्छ रखना चाहता है। मैं शादी के बाद जब पहली बार इंदौर से राजस्थान बस में आ रहा था। रास्ते में हमने एक होटल से नाश्ता लिया और हमारी सीट पर बैठ गए। जब हमने नाश्ता कर दिया तो मैं नाश्ते की प्लेट रास्ते में फेंकने लगा। मेरी पत्नी ने मुझे टोका और फेंकने नहीं दिया। मैंने कहा-रात है, अभी कौन देख रहा है। लेकिन, उसने प्लेट फेंकने की अनुमति नहीं दी। जब तक अगला स्टेशन आया तब तक मैं प्लेट लेकर ही बैठा रहा। फिर अगले स्टेशन पर मुझे उसने कहा अब जाओ और डस्टबीन में डालकर आओ। 

स्वच्छता का यह वाकया साबित करता है कि कोई भी बड़ी सफलता के लिए हर छोटा कदम उपयोगी होता है। साथ ही सामुहिक सफलता के लिए शुरूआत स्वयं से करनी जरूरी होती है। यह वाकया हमें सुनने में जरूर मामूली सा लगता होगा, लेकिन यह बात तय है कि जब तक हर व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझेगा, तब ही हम सफल हो पाएंगे। इसी वजह से आज इंदौर छठीं बार सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा हासिल कर चुका है। देश की प्रगति भी इसमें ही निहित है। यह जरूरी नहीं कि यह नियम हम किसी सामुहिक कार्य के लिए अमल में लाए, यह स्वयं के बदलाव को लेकर भी एक जरूरी सिद्धांत है।

आज के परिप्रेक्ष्य में यह बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि देश में कई ऐसे मामले है, जिसमें सलाह दी जाती है, लेकिन स्वयं इसकी पालना नहीं करते है। नतीजन वह बातें सिर्फ भाषणों और सोशल मीडिया पर अच्छी लगती है, लेकिन वास्तविकता में इसका कोई औचित्य नहीं रहता। आज स्वच्छता की बात कर रहे हैं तो मैं सबसे पहले सरकारी अस्पतालों की ओर रूख करूंगा। सरकारी महकमा अपने अस्पताल को स्वच्छ रखने के लिए कई प्रकार के जतन करता है। लेकिन, सफलता आशानुरूप नहीं मिल पाती है। फिलहाल कई अस्पतालों में बदलाव आए है, लेकिन बड़े स्तर के सरकारी अस्पतालो में जगह-जगह गंदगी और गुटखांे के पीक मिल जाएंगे। यह सामान्य सी बात है। इसमें हर बार अस्पताल प्र्रशासन को कटघरे में लिया जाता है। लेकिन इसके लिए सभी के प्रयास जरूरी है। यदि अस्पताल में आने वाला व्यक्ति यह सोच ली की मैं स्वच्छता के लिए नियमों की पालना करूंगा। इस परिसर में धूम्रपान नहीं करूंगा तो अपने आप ही स्थिति सुधर जाएगी। एक दिन वह भी आएगा कि हमें स्वच्छता के लिए ढोल नहीं पीटना पड़ेगा। निजी अस्पतालों में जहां नियमों की पालना सख्ती से होती है वहीं सरकारी व्यवस्था में ऐसा नहीं हो पाता है।  

- अमित शाह