गुरुवार, 23 मार्च 2023

मीडिया समाज की सार्थकता के लिए टीवी डिबेट पर विचार करना जरूरी

मीडिया चैनलों पर इन दिनों डिबेट की बाढ़ है। न्यूज चैनल खोलते ही आपको एक ऐसी डिबेट मिलेगी, जिसमें लगेगा की खुद को बुद्धिजीवी साबित करने की जंग चल रही है। बात उस समय दर्द दे जाती है जब टिप्पणीकार एंकर को ही आड़े हाथ ले लेता है। एंकर के पास इसके पास एक ही सहारा रहता है कि वह बुलाए अतिथि की आवाज को दबा दे और अपना काम शुरू कर दे। अब प्रश्न यह उठता है कि पत्रकारिता समाज में ऐसे हालात क्यों पैदा हो रहे है? डिबेट करवाने वालों पर ही अंगुलियां उठ रही है। यह सब कहीं टीआरपी की होड़ में तो नहीं हो रहा। हां, यह विचारणीय मुददा है। मीडिया ऐसी डिबेट क्यूं करता है जिसमें न्यूज कम और विवाद ज्यादा उपजे। देश में  सांप्रदायिकता पर हो रही डिबेट तो तुरंत बंद हो जानी चाहिए। यह समझ से परे है कि व्यर्थ के प्रश्न पूछकर हम सभी का समय क्यों बर्बाद करने में तुले हुए है। हमने एक डिबेट में दो-दो समुदाय से दो-दो बुद्धिजीवी बुलाए। अब क्या होगा। जो जिस समुदाय से है वो इसीका पक्ष लेगा। फिर ऐसी डिबेट करवाने से क्या फायदा। महज हमारे चैनलों की टीआरपी बढ़ाने के लिए तेज लाउड में बहस करवाना कहां तक उचित है। उदयपुर कांड के बाद तो चैनलों ने भी नया पैंतरा अपना लिया है। डिबेट से पहले और बीच-बीच में  उदघोषणा की जा रही है कि हमारे चैनल का कोई लेना-देना नहीं है। यह पैनल के विचार है। जब आप स्वयं पैनल को बुलाकर बहस करवा रहे हो तो आप जिम्मेदार क्यों नहीं?

देश में आज भी मीडिया ही एक ऐसा संगठन है जिस पर लोग आंख मुंदकर विश्वास करते हैं। टीवी पर दिखाई जा रहे कंटेंट को लोग अपने आसपास और परिवार में भी साझा करते हैं। एक आम व्यक्ति जो देश के लिए प्रत्यक्ष सहयोग नहीं दे सकता है, लेकिन वह अप्रत्यक्ष रूप से देश के निर्माण में मदद करता है। वह देश की छवि बनाने में मददगार रहता है। उसके लिए वह मीडिया की मदद लेता है। क्योंकि उसे जन्म से यही सीखने को मिलता है कि इस देश में मीडिया भी एक ऐसा समाज है जो हमारे समाज में सत्य और सारगर्भित जानकारियां प्रदान करता है। ऐसे में अति आत्मविश्वास से भरी डिबेट क्यों न बंद हो। 

फेक न्यूज के आरोप में एक एंकर को गिरफ्तार होना पड़ता है। मीडिया समाज के लिए यह अच्छा नहीं है। यदि कोई एंकर फेक न्यूज के आरोप में गिरफ्तार होता है तो यह पूरे संगठन को झकझोर देने वाली घटना है। एंकर सही है या गलत, यह कोर्ट तय करेगी। लेकिन, ऐसी नौबतों से बचने के लिए हमारे मीडिया समाज को जागना होगा। रूपरेखा बनानी होगी। मीडिया के विभिन्न संगठनों को इसके लिए विचार करना होगा। ठोस निर्णात्मक कदम उठाने होंगे, ताकी मीडिया अपने वजूद को बनाए रखे। हम बेपैर की डिबेट चलाकर स्वयं की सच्चाई पर प्रश्न उठाने का अवसर दे रहे हैं। 

- अमित शाह



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